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महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्‌ ।

यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां मैं महर्षियों में भृगु और शब्दों में एक अक्षर अर्थात्‌‌ ओंकार हूँ। सब प्रकार के यज्ञों में जपयज्ञ और स्थिर रहने वालों में हिमालय पहाड़ हूँ॥ *👏प्रणाम 👏श्रीमद्भगवद्गीता आप का। नूतन दिन मंगलमय हो।।🌹🌹भवनिष्ठ🌹🌹--दीन बन्धु शुक्ला